नई दिल्ली. हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक देवशयनी (आषाढ़ी) एकादशी आज 25 जुलाई को मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार आज से भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा में चले जाते हैं, और इसी के साथ चातुर्मास** का पावन काल शुरू हो जाता है। यह व्रत आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है और इसका विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है।
चातुर्मास: अगले 4 महीने किन कामों पर रोक
मान्यता है कि चातुर्मास (आषाढ़ से कार्तिक तक) के दौरान भगवान विष्णु के शयन में होने से मांगलिक कार्यों पर विराम रहता है। अगले चार महीने आमतौर पर इन कार्यों को शुभ नहीं माना जाता:
- विवाह और सगाई
- गृह प्रवेश
- मुंडन संस्कार
- नए भवन/दुकान का शुभारंभ, बड़े नए निवेश
चातुर्मास का समापन देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी पर होता है, जब भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं और फिर से मांगलिक कार्य शुरू होते हैं।
व्रत का महत्व और पूजा विधि
देवशयनी एकादशी का व्रत पापों के नाश और मोक्ष की प्राप्ति के लिए रखा जाता है:
- प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करें, पीले वस्त्र और पीले फूल अर्पित करें
- तुलसी दल के साथ भोग लगाएं (एकादशी पर तुलसी न तोड़ें, पहले से रखी तुलसी अर्पित करें)
- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें
- दिनभर अन्न से परहेज, फलाहार करें; जरूरतमंदों को दान दें
- रात्रि जागरण और विष्णु सहस्रनाम का पाठ शुभ माना जाता है
चातुर्मास: सिर्फ रोक नहीं, साधना का काल भी
चातुर्मास को केवल मांगलिक कार्यों पर रोक का समय नहीं, बल्कि साधना, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का काल भी माना जाता है। इस दौरान साधु-संत एक स्थान पर रुककर तप और प्रवचन करते हैं। श्रद्धालु व्रत, दान, जप और सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं। मानसून के इस मौसम में सात्विक भोजन और संयम को सेहत के लिहाज से भी लाभकारी बताया गया है। कुल मिलाकर देवशयनी एकादशी से शुरू यह चार महीने भक्ति और आत्मशुद्धि के माने जाते हैं।
(यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पंचांग पर आधारित है।)
Sources: The India Moves | The Printlines

